आम चुनाव के पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सभी वर्गों को रिझाने में जुटे हैं। किसानों, गरीबों और युवाओं को अपनी तरफ लाने के लिए वह नई नई योजनाएं आ रहे हैं, ताकि 2019 में 2014 जैसा इतिहास दोहराया जा सके। लेकिन अर्थशास्त्री और समाज शास्त्री सरकार की नीति और कदमों से बेहद खफा है। उन्होंने आर्थिक आंकड़ों में राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर चिंता जताई है। और एक संयुक्त बयान में सांख्यिकी संगठनों की संस्थागत स्वतंत्रता बहाल करने का आह्वान भी किया है।
पिछले दिनों बेरोजगारी को लेकर एनएसएसओ की रिपोर्ट सामने आई थी जिसमें कहा गया था बेरोजगारी की दर 45 साल के सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच गई लेकिन मोदी सरकार ने एनएसएसओ की रिपोर्ट को खारिज कर दिया था। इसके बाद एक और रिपोर्ट सामने आई थी जिसमें देश में भारी बेरोजगारी की बात कही गई थी। इतना ही नहीं पिछले साल सांख्यिकी मशीनरी के कुछ आंकड़े भी सामने आए थे जिसमे कहा गया था कि मनमोहन सरकार के राज में जीडीपी दर काफी ज्यादा थी जो मोदी राज में घट गई। इसे लेकर भी मोदी सरकार घिर गई थी, इसके बाद सरकार की तरफ से इन आंकड़ों में भी संशोधन कर दिया गया। सरकार की इसी दखलअंदाजी को लेकर अर्थशास्त्री और समाज शास्त्रियों ने आवाज बुलंद की है और राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर चिंता जताई है। कुल 108 विशेषज्ञों ने संयुक्त बयान में सांख्यिकी संगठनों की संस्थागत स्वतंत्रता बहाल करने का आवाहन किया है।
बयान में कहा गया है कि दशकों से भारत की सांख्यिकी मशीनरी के आर्थिक से सामाजिक मानदंडों पर उसके आंकड़ों को लेकर बेहतर साख रही है। बयान में कहा गया है कि आंकड़ों के अनुमान की गुणवत्ता को लेकर उसकी सांख्यिकी मशीनरी की आलोचना की जाती रही है, लेकिन निर्णय को प्रभावित करने और अनुमान को लेकर राजनीति हस्तक्षेप का कभी आरोप नहीं लगा। इसलिए उन्होंने सभी पेशेवर अर्थशास्त्रियों, सांख्यिकी विद और स्वतंत्र शोधकर्ताओं के साथ आकर प्रतिकूल आंकड़ों को दबाने के खिलाफ आवाज उठाने को कहा।
इसे लेकर कांग्रेस ने सरकार पर हमला बोला है। कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ट्वीट कर कहा कि भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को किसी ने भी मोदी सरकार से ज्यादा आघात नहीं पहुंचाया है। 108 अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्री एवं समाजशास्त्री चिंतित हैं और आपको भी चिंतित होना चाहिए। साथ ही उन्होंने सभी से ऐसी सरकार को उखाड़ फेंकने की अपील की है। आपकी क्या राय है इस बारे में? कमेंट के माध्यम से जरूर बताएं।
पिछले दिनों बेरोजगारी को लेकर एनएसएसओ की रिपोर्ट सामने आई थी जिसमें कहा गया था बेरोजगारी की दर 45 साल के सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच गई लेकिन मोदी सरकार ने एनएसएसओ की रिपोर्ट को खारिज कर दिया था। इसके बाद एक और रिपोर्ट सामने आई थी जिसमें देश में भारी बेरोजगारी की बात कही गई थी। इतना ही नहीं पिछले साल सांख्यिकी मशीनरी के कुछ आंकड़े भी सामने आए थे जिसमे कहा गया था कि मनमोहन सरकार के राज में जीडीपी दर काफी ज्यादा थी जो मोदी राज में घट गई। इसे लेकर भी मोदी सरकार घिर गई थी, इसके बाद सरकार की तरफ से इन आंकड़ों में भी संशोधन कर दिया गया। सरकार की इसी दखलअंदाजी को लेकर अर्थशास्त्री और समाज शास्त्रियों ने आवाज बुलंद की है और राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर चिंता जताई है। कुल 108 विशेषज्ञों ने संयुक्त बयान में सांख्यिकी संगठनों की संस्थागत स्वतंत्रता बहाल करने का आवाहन किया है।
बयान में कहा गया है कि दशकों से भारत की सांख्यिकी मशीनरी के आर्थिक से सामाजिक मानदंडों पर उसके आंकड़ों को लेकर बेहतर साख रही है। बयान में कहा गया है कि आंकड़ों के अनुमान की गुणवत्ता को लेकर उसकी सांख्यिकी मशीनरी की आलोचना की जाती रही है, लेकिन निर्णय को प्रभावित करने और अनुमान को लेकर राजनीति हस्तक्षेप का कभी आरोप नहीं लगा। इसलिए उन्होंने सभी पेशेवर अर्थशास्त्रियों, सांख्यिकी विद और स्वतंत्र शोधकर्ताओं के साथ आकर प्रतिकूल आंकड़ों को दबाने के खिलाफ आवाज उठाने को कहा।
इसे लेकर कांग्रेस ने सरकार पर हमला बोला है। कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ट्वीट कर कहा कि भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को किसी ने भी मोदी सरकार से ज्यादा आघात नहीं पहुंचाया है। 108 अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्री एवं समाजशास्त्री चिंतित हैं और आपको भी चिंतित होना चाहिए। साथ ही उन्होंने सभी से ऐसी सरकार को उखाड़ फेंकने की अपील की है। आपकी क्या राय है इस बारे में? कमेंट के माध्यम से जरूर बताएं।





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