नमस्कार मित्रों, आपके मन में भी यह प्रश्न कभी न कभी अनायास आया ही होगा की धर्म क्या है ? इसकी परिभाषा क्या है? इसी विषय पर आज हम अपना यह लेख लेकर आये है। तो आइये जानते है धर्म क्या है। धर्म की परिभाषा देश, काल व परिस्थिति के अनुसार बदल जाती है। पहली और महत्वपूर्ण बात यह है कि सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं होता है । आप कोई भी कार्य कर रहे हैं अगर आप उस कार्य को किसी भी परिस्थिति में इमानदारी पूर्वक सत्यनिष्ठ होकर कर रहे हैं तो वही आपका धर्म है।
हमारे यहां कहा गया अहिंसा परमो धर्मः। मन, वचन, कर्म से ही हिंसा ना करना यही मनुष्य का परम धर्म है। लेकिन यह सूत्र बॉर्डर पर लड़ रहे सैनिक पर लागू नहीं होता है। उनका धर्म है अपने राष्ट्र की रक्षा के लिए दुश्मनों के ऊपर प्रहार करना। शत्रु से अपनी मातृभूमि की रक्षा करना एक सैनिक का परम धर्म है। तो परिस्तियों के अनुसार धर्म हमारा बदल जाता है। धर्म की परिभाषा बदल जाती है।
मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः, आचार्य देवो भव:, अतिथि देवो भवः । अर्थात माता-पिता की सेवा करना, गुरुजनों की सेवा करना और घर आये हुए अतिथि की सेवा करना, जो बगैर तिथि बताए अचानक हमारे द्वार पर आ जाए उसकी सेवा करना । यह सभी हमारे धर्म है लेकिन समयानुसार देश, काल व परिस्थिति के अनुसार धर्म की परिभाषा बदल जाती है। उम्मीद करते हैं आपको हमारा यह लेख पसंद आया होगा। बने रहिए हमारे साथ । हमारे साथ जुड़ने के लिए आप सभी का तहे दिल से धन्यवाद, क्योंकि आप हैं तो हम हैं।


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